न्यायाधिकरण सुधार विधेयक 2026 से राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना का मार्ग प्रशस्त
न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल गई है, जिसमें न्यायाधिकरणों के प्रशासन, नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल में एकरूपता के लिए राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (NTC) की स्थापना का प्रावधान है। प्रस्तावित NTC एक स्वायत्त निकाय होगा, जो नियुक्तियों की सिफारिश, न्यायाधिकरणों की निगरानी, सदस्यों से संबंधित जांच और National Tribunals Data Grid के संचालन जैसे कार्य करेगा। आयोग में 5 सदस्य होंगे तथा नियुक्ति प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने के लिए चयन समिति की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर नियुक्ति करने का प्रावधान है। विधेयक में अध्यक्ष के लिए 5 वर्ष या 70 वर्ष तथा सदस्यों के लिए 5 वर्ष या 67 वर्ष की आयु तक कार्यकाल निर्धारित किया गया है और 16 प्रमुख न्यायाधिकरणों को इसके दायरे में शामिल किया गया है।
न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल गई है। इसका प्रमुख उद्देश्य भारत में न्यायाधिकरणों की नियुक्ति, सेवा शर्तों, कार्यकाल और प्रशासन के लिए एक अधिक एकीकृत एवं संस्थागत व्यवस्था विकसित करना है। विधेयक में राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (National Tribunals Commission–NTC) की स्थापना का प्रावधान किया गया है। यह पहल न्यायाधिकरणों की कार्यक्षमता और प्रशासनिक स्वतंत्रता से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही समस्याओं को दूर करने का प्रयास है।
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की भूमिका
प्रस्तावित NTC एक स्वायत्त निकाय के रूप में न्यायाधिकरणों के प्रशासन की देखरेख करेगा और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में होगा। आयोग का प्रमुख कार्य न्यायाधिकरणों में रिक्तियों के लिए उम्मीदवारों की सिफारिश करना, उनके कामकाज की निगरानी करना, सदस्यों के विरुद्ध आवश्यक जांच करना तथा नियुक्तियों और सेवा शर्तों में एकरूपता सुनिश्चित करना होगा। इसके अतिरिक्त National Tribunals Data Grid के माध्यम से न्यायाधिकरणों से संबंधित आंकड़ों और मामलों की निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया जाएगा।
आयोग की संरचना और विशेषज्ञता
प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग में 5 सदस्य होंगे। इसमें एक अध्यक्ष, दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य होंगे। अध्यक्ष के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान है। तकनीकी सदस्यों के लिए लोक प्रशासन, वित्त, कानून, प्रबंधन, बैंकिंग, IT अथवा लेखांकन जैसे क्षेत्रों में कम-से-कम 25 वर्ष का अनुभव निर्धारित किया गया है। इससे न्यायिक विशेषज्ञता के साथ-साथ प्रशासनिक और तकनीकी विशेषज्ञता को भी संस्थागत रूप देने का प्रयास किया गया है।
नियुक्ति प्रक्रिया में समयबद्धता
विधेयक का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य न्यायाधिकरणों में लंबे समय से चली आ रही रिक्तियों और नियुक्ति में देरी की समस्या को कम करना है। चयन समिति द्वारा नामों की सिफारिश किए जाने के बाद केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर नियुक्ति करने की व्यवस्था प्रस्तावित है। यदि चयनित उम्मीदवार नियुक्त नहीं किया जाता है, तो चयन समिति द्वारा एक प्रतीक्षारत उम्मीदवार का नाम भी सुझाया जाएगा। इससे न्यायाधिकरणों में पदों को लंबे समय तक रिक्त रहने से रोकने में सहायता मिल सकती है।
सदस्यों के कार्यकाल और न्यायाधिकरणों का दायरा
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार न्यायाधिकरण अध्यक्ष का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होगा। अन्य सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष या 67 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक निर्धारित किया गया है। प्रदर्शन के आधार पर पुनर्नियुक्ति का भी प्रावधान है। विधेयक के अंतर्गत 16 प्रमुख न्यायाधिकरणों और अपीलीय न्यायाधिकरणों को शामिल करने का प्रावधान है, जिनमें CAT, NGT, ITAT, CESTAT, DRT और TDSAT जैसे महत्वपूर्ण निकाय शामिल हैं।
UPSC के लिए न्यायाधिकरण सुधार का व्यापक महत्व
भारत में न्यायाधिकरणों का उद्देश्य विशेष प्रकार के विवादों का विशेषज्ञतापूर्ण और अपेक्षाकृत त्वरित निपटारा करना तथा उच्च न्यायालयों के कार्यभार को कम करना है। हालांकि, रिक्तियों, नियुक्ति में देरी, प्रशासनिक निर्भरता और स्वतंत्रता से संबंधित चुनौतियों ने उनकी प्रभावशीलता को प्रभावित किया है। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना से judicial independence, administrative efficiency, transparency और accountability के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है। UPSC में इसे GS Paper-2—Judiciary, Tribunals, Separation of Powers, Judicial Independence और Governance से जोड़ा जा सकता है।
