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विश्व बांस दिवस 2026 — सतत विकास, आजीविका और जलवायु अनुकूलन में बांस का महत्व

Published 17 September 2026

विश्व बांस दिवस प्रत्येक वर्ष 18 सितंबर को बांस के पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक महत्व तथा इसके सतत उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। World Bamboo Organization (WBO) ने 18 सितंबर 2009 को बैंकॉक में आयोजित 8वीं World Bamboo Congress में इस दिवस की घोषणा की थी। बांस एक तेजी से बढ़ने वाली बहुवर्षीय घास है, जो मृदा संरक्षण, भूमि पुनर्स्थापन, कार्बन अवशोषण और नवीकरणीय कच्चे माल के रूप में महत्वपूर्ण है। भारत में बांस ग्रामीण एवं आदिवासी आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है तथा राष्ट्रीय बांस मिशन के माध्यम से इसकी खेती, प्रसंस्करण, उत्पाद विकास और बाजार संपर्क को बढ़ावा दिया जा रहा है।

विश्व बांस दिवस (World Bamboo Day) प्रत्येक वर्ष 18 सितंबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बांस के पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक महत्व के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना तथा बांस के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करना है। यह दिवस बांस क्षेत्र से जुड़े किसानों, कारीगरों, उद्योगों और समुदायों के योगदान को भी रेखांकित करता है।

विश्व बांस संगठन और दिवस की शुरुआत:

विश्व बांस दिवस की स्थापना World Bamboo Organization (WBO) द्वारा की गई थी। 18 सितंबर 2009 को बैंकॉक में आयोजित 8वीं World Bamboo Congress के दौरान इस दिवस की घोषणा की गई थी। 18 सितंबर को चुनने का संबंध WBO के पूर्व अध्यक्ष डेविड नाइट के जन्मदिन से भी जोड़ा जाता है।

बांस की पारिस्थितिक भूमिका:

बांस एक तेजी से बढ़ने वाला बहुवर्षीय घास (grass) है, पेड़ नहीं। इसकी तीव्र वृद्धि के कारण यह विभिन्न प्रकार के उत्पादों के लिए नवीकरणीय कच्चा माल उपलब्ध करा सकता है। बांस मृदा संरक्षण, भूमि पुनर्स्थापन और कार्बन अवशोषण में योगदान दे सकता है। हालांकि, इसके पर्यावरणीय लाभ बांस की प्रजाति, प्रबंधन पद्धति और स्थानीय पारिस्थितिकी पर निर्भर करते हैं।

भारत में बांस का महत्व:

भारत बांस की विविधता और उत्पादन की दृष्टि से दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 में 2017 के संशोधन के बाद गैर-वन क्षेत्रों में उगने वाले बांस को पेड़ की परिभाषा से बाहर किया गया, जिससे किसानों और निजी भूमि मालिकों के लिए बांस की खेती एवं परिवहन को आसान बनाने का प्रयास किया गया। बांस का उपयोग हस्तशिल्प, फर्नीचर, निर्माण सामग्री, कागज, खाद्य पदार्थ, जैव-ऊर्जा और बायोचार जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।

बांस और ग्रामीण आजीविका:

बांस आधारित उद्योग ग्रामीण एवं आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार और आय का स्रोत बन सकते हैं। भारत सरकार ने बांस क्षेत्र के विकास के लिए राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) को पुनर्गठित रूप में लागू किया है, जिसका उद्देश्य बांस की खेती, प्रसंस्करण, उत्पाद विकास और बाजार संपर्क को बढ़ावा देना है। इससे कृषि विविधीकरण और स्थानीय मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की संभावना है।

UPSC के लिए महत्व:

यह विषय GS Paper-I में पर्यावरण एवं जैव-विविधता, GS Paper-III में कृषि, पर्यावरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सतत विकास तथा SDGs से जोड़ा जा सकता है। UPSC के लिए बांस को केवल वन उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन, आजीविका, कृषि-विविधीकरण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है। साथ ही, बांस को बढ़ावा देते समय स्थानीय जैव-विविधता, आक्रामक प्रजातियों और टिकाऊ कटाई से जुड़े पहलुओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

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