अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस 2026: बढ़ती वृद्ध आबादी के बीच स्वस्थ, सम्मानजनक और समावेशी वृद्धावस्था पर जोर
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस प्रत्येक वर्ष 1 अक्टूबर को मनाया जाता है, जिसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1990 में की थी। इसका उद्देश्य वृद्धजनों के अधिकार, गरिमा, सामाजिक भागीदारी और सम्मानजनक जीवन के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। भारत में बढ़ती जीवन प्रत्याशा और घटती प्रजनन दर के कारण वृद्ध आबादी बढ़ रही है, जिससे स्वास्थ्य, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और दीर्घकालिक देखभाल जैसी चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। Active Ageing के माध्यम से वृद्धजनों की स्वास्थ्य, भागीदारी और सुरक्षा सुनिश्चित कर उनके अनुभव एवं कौशल को सामाजिक-आर्थिक विकास में उपयोग किया जा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस (International Day of Older Persons) प्रत्येक वर्ष 1 अक्टूबर को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसंबर 1990 को प्रस्ताव 45/106 के माध्यम से इस दिवस की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य वृद्ध व्यक्तियों के योगदान, अधिकारों और गरिमापूर्ण जीवन के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है।
2026 की थीम और वृद्धावस्था की बदलती अवधारणा
2026 में इस दिवस का केंद्र वृद्धावस्था को केवल स्वास्थ्य या निर्भरता के मुद्दे के रूप में देखने के बजाय गरिमा, सामाजिक भागीदारी, अधिकार और सक्रिय वृद्धावस्था से जोड़ना है। UPSC के लिए यह विषय बदलती जनसांख्यिकी, बढ़ती जीवन प्रत्याशा और वृद्ध आबादी की सामाजिक एवं आर्थिक भागीदारी के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
भारत में वृद्ध आबादी की चुनौती
भारत में जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, प्रजनन दर में गिरावट और परिवार के आकार में परिवर्तन के कारण वृद्ध आबादी का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, दीर्घकालिक देखभाल, मानसिक स्वास्थ्य और अकेलेपन जैसी चुनौतियाँ बढ़ती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा तक सीमित पहुंच इस चुनौती को और जटिल बनाती है।
वृद्धजनों के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा
वृद्धजनों के लिए केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है; उन्हें स्वास्थ्य, आवास, पोषण, सामाजिक भागीदारी, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार सुनिश्चित करना आवश्यक है। भारत में Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 तथा National Programme for Health Care of the Elderly (NPHCE) जैसी व्यवस्थाएँ वृद्धजनों के कल्याण और स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करती हैं।
UPSC में ‘Active Ageing’ और जनसांख्यिकीय संक्रमण
वृद्धावस्था को Active Ageing के दृष्टिकोण से देखना महत्वपूर्ण है, जिसमें व्यक्ति की स्वास्थ्य, भागीदारी और सुरक्षा संबंधी क्षमताओं को अधिकतम करने पर जोर दिया जाता है। भारत वर्तमान में demographic transition से गुजर रहा है; इसलिए वृद्ध आबादी को बोझ के बजाय मानव पूंजी के रूप में देखना आवश्यक है। वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव, कौशल और ज्ञान का उपयोग सामाजिक एवं आर्थिक विकास में किया जा सकता है।
UPSC के लिए व्यापक प्रासंगिकता
यह विषय GS Paper-I में भारतीय समाज एवं जनसांख्यिकी, GS Paper-II में स्वास्थ्य, कल्याणकारी योजनाएँ और कमजोर वर्ग, तथा Essay के लिए महत्वपूर्ण है। Mains में उत्तर लिखते समय वृद्धावस्था की गरिमा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज, सामाजिक पेंशन, डिजिटल समावेशन, जेरियाट्रिक केयर, अंतर-पीढ़ीगत संबंध और आयु-अनुकूल बुनियादी ढाँचे जैसे समाधान शामिल किए जा सकते हैं। दीर्घकाल में भारत की नीतियों को “healthy ageing” और “age-friendly society” की दिशा में आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।