CSIR-IICT ने डायबिटिक फुट अल्सर के उपचार हेतु फाइटोफार्मास्युटिकल तकनीक का हस्तांतरण किया
CSIR-IICT, हैदराबाद ने Viridis BioPharma के साथ जिम्नेमा सिल्वेस्ट्रे से विकसित डायबिटिक फुट अल्सर के उपचार हेतु IND-रेडी फाइटोफार्मास्युटिकल के प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह उत्पाद CSIR Phytopharmaceutical Mission Phase-III के तहत विकसित हुआ है तथा प्री-क्लिनिकल विकास, वानस्पतिक मानकीकरण और GLP-अनुपालन सुरक्षा अध्ययन पूरे हो चुके हैं। अब यह क्लिनिकल परीक्षण एवं व्यावसायिक विकास की ओर बढ़ रहा है, जबकि CDSCO और US FDA के समक्ष नियामक आवेदन की योजना है। यह पहल स्वदेशी औषधि अनुसंधान, जैव-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य नवाचार और वैज्ञानिक अनुसंधान के व्यावसायीकरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
CSIR-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (CSIR-IICT), हैदराबाद ने Viridis BioPharma के साथ डायबिटिक फुट अल्सर के उपचार के लिए विकसित एक IND-रेडी फाइटोफार्मास्युटिकल के संबंध में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता वैज्ञानिक अनुसंधान को क्लिनिकल विकास और व्यावसायिक उपयोग तक ले जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
जिम्नेमा सिल्वेस्ट्रे से विकसित उपचार
यह फाइटोफार्मास्युटिकल जिम्नेमा सिल्वेस्ट्रे (Gymnema sylvestre) नामक वानस्पतिक स्रोत से विकसित किया गया है और विशेष रूप से घाव प्रबंधन के लिए लक्षित है। इसका प्राथमिक उपयोग डायबिटिक फुट अल्सर के उपचार में किया जाना है, जबकि इसके संभावित द्वितीयक उपयोगों में क्रोनिक घाव और सूजन संबंधी त्वचा विकार शामिल हैं।
डायबिटिक फुट अल्सर का महत्व
डायबिटिक फुट अल्सर मधुमेह से जुड़ी एक गंभीर जटिलता है, जो घाव भरने की क्षमता में कमी के कारण लंबे समय तक बनी रह सकती है। उपलब्ध सूचना के अनुसार, यह लगभग 20% मधुमेह रोगियों को प्रभावित करता है। इसलिए पौधों से प्राप्त मानकीकृत उपचार विकसित करना सार्वजनिक स्वास्थ्य, किफायती चिकित्सा और जैव-संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
फाइटोफार्मास्युटिकल विकास और परीक्षण
इस उत्पाद को CSIR Phytopharmaceutical Mission Phase-III के अंतर्गत CSIR-IICT के अनुप्रयुक्त जीवविज्ञान विभाग द्वारा विकसित किया गया है। इसके प्री-क्लिनिकल विकास, वानस्पतिक मानकीकरण और GLP-अनुपालन सुरक्षा अध्ययन पूरे हो चुके हैं। अब यह क्लिनिकल परीक्षण और व्यावसायिक विकास के अगले चरण की ओर बढ़ रहा है।
नियामक एवं वैश्विक विकास की संभावना
परियोजना के अगले चरण में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) तथा US Food and Drug Administration (US FDA) के समक्ष नियामक आवेदन प्रस्तुत करने की योजना है। यह भारत में विकसित जैव-आधारित औषधीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय नियामक मानकों के अनुरूप विकसित करने और वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने की संभावना को दर्शाता है।
CSIR और CSIR-IICT का महत्व
CSIR-IICT वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक घटक प्रयोगशाला है और हैदराबाद, तेलंगाना में स्थित है। CSIR की स्थापना 26 सितंबर 1942 को हुई थी और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। भारत के प्रधानमंत्री CSIR के पदेन अध्यक्ष होते हैं। UPSC के लिए यह विषय स्वदेशी अनुसंधान, जैव-प्रौद्योगिकी, औषधि विकास, उद्योग-अकादमिक सहयोग और विज्ञान के व्यावसायीकरण से जुड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण है।
