FCRA संशोधन विधेयक 2026 को 31 सदस्यीय JPC के पास भेजा गया
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को विपक्ष के विरोध के बीच 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया है, जिसे 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक का उद्देश्य FCRA, 2010 के तहत विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों के नियमन, परिसंपत्तियों के प्रबंधन और जवाबदेही को मजबूत करना है। इसमें FCRA प्रमाणपत्र रद्द या समाप्त होने वाले संगठनों की विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियों के लिए Designated Authority तथा दंड एवं अनुपालन व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव है। विपक्ष ने NGOs और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है, जबकि JPC विधेयक की विस्तृत जांच, हितधारकों से परामर्श और संभावित संशोधनों पर विचार करेगी।
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को विपक्ष के विरोध के बीच 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया है। यह विधेयक मूल रूप से 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान प्राप्त करने एवं उसके उपयोग से संबंधित मौजूदा FCRA, 2010 व्यवस्था में बदलाव करना है।
FCRA क्या है और इसका महत्व क्या है?
Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010 भारत में विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन, प्रतिभूतियों या अन्य निर्धारित योगदान की स्वीकृति और उपयोग को नियंत्रित करता है। इसके तहत कुछ सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, धार्मिक और आर्थिक कार्यक्रम संचालित करने वाले संगठनों को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए केंद्र सरकार से FCRA registration या prior permission प्राप्त करनी होती है। इसका प्रमुख उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
विधेयक में प्रस्तावित प्रमुख बदलाव
विधेयक का प्रमुख प्रावधान उन संगठनों की विदेशी अंशदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन से संबंधित है जिनका FCRA प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या समाप्त हो जाता है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा एक Designated Authority बनाए जाने का प्रस्ताव है, जो ऐसी परिसंपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन और निपटान कर सकेगी। कुछ परिस्थितियों में परिसंपत्तियों का इस प्राधिकरण में स्थायी निहितीकरण भी प्रस्तावित है।
प्रस्तावित व्यवस्था में दंड और अनुपालन से जुड़े बदलाव
विधेयक केवल परिसंपत्तियों से संबंधित प्रावधानों तक सीमित नहीं है। इसमें FCRA के तहत penalties को rationalise करने का प्रस्ताव भी है। PRS के अनुसार, उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास को मौजूदा 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष करने का प्रस्ताव है। साथ ही, कुछ जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है।
विपक्ष की आपत्तियाँ और JPC की भूमिका
विपक्षी दलों तथा कुछ नागरिक समाज और धार्मिक संगठनों ने विधेयक के संभावित प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है, विशेषकर NGOs, अल्पसंख्यक संस्थाओं और विदेशी वित्त पोषण पर निर्भर संगठनों के संदर्भ में। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि विदेशी योगदान के नियमन को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाना आवश्यक है। JPC का उद्देश्य विधेयक के प्रावधानों की विस्तृत संसदीय जांच, हितधारकों से विचार-विमर्श और संभावित संशोधनों के लिए एक मंच उपलब्ध कराना है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार विधेयक को 31 सदस्यीय JPC को भेजा गया है।
UPSC के लिए संसदीय दृष्टिकोण से महत्व
यह घटनाक्रम संसदीय समितियों की भूमिका और विधायी scrutiny को समझने का महत्वपूर्ण उदाहरण है। JPC दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाली ad hoc parliamentary committee होती है, जिसका गठन किसी विशेष विधेयक या विषय की जांच के लिए किया जाता है। FCRA विधेयक का JPC के पास जाना यह दर्शाता है कि संवेदनशील कानूनों में राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी वित्तीय नियंत्रण के साथ-साथ नागरिक स्वतंत्रता, NGO की स्वायत्तता, पारदर्शिता और जवाबदेही के बीच संतुलन आवश्यक है। UPSC में इसे GS Paper-2—Parliament, Parliamentary Committees, NGOs, Governance और Fundamental Rights से जोड़ा जा सकता है।
