जयंती प्रसाद को IBBI अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार, दिवालियापन व्यवस्था में नेतृत्व की निरंतरता
IBBI के पूर्णकालिक सदस्य जयंती प्रसाद को 13 सितंबर 2026 से IBBI अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है, जो पूर्व अध्यक्ष रवि मित्तल के कार्यकाल समाप्त होने के बाद लागू हुआ। यह जिम्मेदारी 20 नवंबर 2026 तक या नए अध्यक्ष की नियुक्ति तक, जो भी पहले हो, जारी रहेगी। IBBI, IBC 2016 के तहत भारत की दिवालियापन व्यवस्था का प्रमुख नियामक है और दिवालियापन पेशेवरों, एजेंसियों व सूचना उपयोगिताओं को विनियमित करता है। प्रभावी दिवालियापन समाधान से NPA वसूली, ऋण अनुशासन, परिसंपत्ति मूल्य संरक्षण और वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता को मजबूती मिलती है।
IBBI के पूर्णकालिक सदस्य जयंती प्रसाद को भारतीय दिवालियापन एवं दिवालिया बोर्ड (IBBI) के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। उन्होंने 13 सितंबर 2026 से यह जिम्मेदारी संभाली। यह व्यवस्था पूर्व अध्यक्ष रवि मित्तल के कार्यकाल समाप्त होने के बाद की गई है।
अतिरिक्त प्रभार की अवधि:
जयंती प्रसाद अध्यक्ष के रूप में अपनी मौजूदा पूर्णकालिक सदस्य की जिम्मेदारियों के साथ कार्य करेंगे। यह अतिरिक्त जिम्मेदारी 20 नवंबर 2026 तक, या नए अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक अथवा अगले आदेश तक—जो भी पहले हो—जारी रहेगी। इससे नेतृत्व परिवर्तन के दौरान नियामक संस्था के कामकाज में निरंतरता बनी रहती है।
IBBI की भूमिका:
Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) भारत की दिवालियापन व्यवस्था का प्रमुख नियामक है। यह दिवालियापन पेशेवरों, दिवालियापन पेशेवर एजेंसियों और सूचना उपयोगिताओं जैसे संस्थागत तंत्र को विनियमित करता है। इसका उद्देश्य दिवालियापन समाधान प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और प्रभावी बनाना है।
IBC, 2016 से संबंध:
IBBI की स्थापना Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), 2016 के तहत की गई थी। IBC ने कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों से संबंधित दिवालियापन मामलों के समाधान के लिए एक समेकित कानूनी ढांचा उपलब्ध कराया। इसका प्रमुख उद्देश्य वित्तीय संकट में फंसी परिसंपत्तियों के समाधान को समयबद्ध बनाना और परिसंपत्तियों के मूल्य को संरक्षित करना है।
बैंकिंग एवं वित्तीय क्षेत्र में महत्व:
दिवालियापन समाधान तंत्र का प्रभाव बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों की Non-Performing Assets (NPAs) की वसूली तथा ऋण बाजार की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। प्रभावी दिवालियापन व्यवस्था से संकटग्रस्त कंपनियों के पुनर्गठन या परिसमापन के लिए स्पष्ट प्रक्रिया मिलती है और लेनदारों के हितों की रक्षा में सहायता मिलती है। इसलिए IBBI का कार्य भारत के वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता और ऋण अनुशासन से जुड़ा है।
UPSC के लिए प्रासंगिकता:
यह समाचार भारतीय अर्थव्यवस्था, बैंकिंग सुधार, वित्तीय क्षेत्र, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और दिवालियापन कानून से संबंधित है। UPSC में इससे जुड़े प्रश्नों में IBBI की भूमिका, IBC 2016 की विशेषताएँ, Corporate Insolvency Resolution Process (CIRP), लेनदारों की भूमिका, NPA समाधान और परिसंपत्ति मूल्य संरक्षण जैसे पहलुओं को जोड़ा जा सकता है।