RBI ने बाजार जोखिम के लिए संशोधित पूंजी आवश्यकताएँ जारी कीं, Basel III मानकों के अनुरूप होगा नया ढांचा
RBI ने वाणिज्यिक बैंकों के लिए Market Risk के संबंध में Minimum Capital Requirements Directions, 2026 जारी किए हैं, जो संशोधित Basel III मानकों के अनुरूप हैं। नया ढांचा 1 अप्रैल 2027 से लागू होगा और बाजार जोखिम के विरुद्ध बैंकों की नियामकीय पूंजी की गणना को अधिक जोखिम-संवेदनशील बनाएगा। दिशानिर्देशों में Trading Book, Net Open Position, विदेशी मुद्रा जोखिम, ब्याज दर जोखिम, Debt Mutual Funds और ETFs के पूंजीगत उपचार में बदलाव किए गए हैं। साथ ही Credit Derivatives और Total Return Swap (TRS) के उपचार को संशोधित किया गया है, जिसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त पूंजी, बेहतर जोखिम प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वाणिज्यिक बैंकों के लिए Market Risk के संबंध में Minimum Capital Requirements Directions, 2026 जारी किए हैं। इनका उद्देश्य बैंकों द्वारा बाजार जोखिम के विरुद्ध रखी जाने वाली नियामक पूंजी की गणना के नियमों को संशोधित करना और भारतीय बैंकिंग नियमन को संशोधित Basel III मानकों के साथ अधिक निकटता से जोड़ना है। बाजार जोखिम में ब्याज दर, विदेशी विनिमय दर, इक्विटी कीमतों तथा अन्य बाजार कीमतों में बदलाव से होने वाले संभावित नुकसान शामिल होते हैं।
1 अप्रैल 2027 से लागू होगा नया ढांचा:
नए दिशानिर्देश 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होंगे। इससे बैंकों को नए पूंजी-गणना ढांचे, जोखिम प्रबंधन प्रणालियों और आंतरिक प्रक्रियाओं को लागू करने के लिए संक्रमण अवधि मिलेगी। RBI का व्यापक उद्देश्य नियामकीय आवश्यकताओं को जोखिम-संवेदनशील बनाने के साथ-साथ उनके अनुपालन को सरल और व्यावहारिक बनाना है।
ट्रेडिंग बुक और विदेशी मुद्रा जोखिम:
अंतिम दिशानिर्देशों में ट्रेडिंग बुक के दायरे से संबंधित प्रावधानों को RBI के मौजूदा निवेश दिशानिर्देशों के साथ जोड़ा गया है। इसके अलावा Net Open Position (NOP) तथा विदेशी मुद्रा जोखिम के लिए पूंजीगत शुल्क को पूंजी पर्याप्तता संबंधी व्यापक नियामकीय ढांचे के अनुरूप किया गया है। बाजार जोखिम के संदर्भ में ट्रेडिंग बुक में रखी परिसंपत्तियों और विदेशी मुद्रा जैसी खुली स्थितियों के मूल्य में बदलाव बैंक की पूंजी पर प्रभाव डाल सकते हैं।
ब्याज दर जोखिम और डेट फंड्स का उपचार:
संशोधित ढांचे में Interest Rate Risk के लिए विशिष्ट जोखिम पूंजी शुल्क में बदलाव किया गया है। साथ ही ट्रेडिंग बुक में रखे गए Debt Mutual Funds और Exchange Traded Funds (ETFs) के पूंजीगत उपचार को उनके अंतर्निहित जोखिम कारकों के अधिक निकट लाने का प्रयास किया गया है। इससे नियामकीय पूंजी आवश्यकता को निवेश में मौजूद वास्तविक जोखिम के साथ बेहतर तरीके से जोड़ने में सहायता मिलेगी।
Credit Derivatives और Basel III से संबंध:
दिशानिर्देशों में Credit Derivatives के माध्यम से hedge की गई स्थितियों के उपचार को भी संशोधित किया गया है, जिसमें अनुमत Total Return Swap (TRS) जैसी संरचनाएँ शामिल हैं। यह पूरी प्रक्रिया RBI द्वारा भारतीय बैंकिंग प्रणाली में Basel III के अंतरराष्ट्रीय जोखिम-आधारित पूंजी मानकों को लागू करने की व्यापक पहल का हिस्सा है। Basel III का प्रमुख फोकस बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त पूंजी, बेहतर जोखिम प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता को मजबूत करना है।
UPSC के लिए महत्व:
यह मुद्दा भारतीय अर्थव्यवस्था, बैंकिंग क्षेत्र, वित्तीय स्थिरता, Basel III, Capital Adequacy, Market Risk और RBI के नियामकीय कार्यों से जुड़ा है। बाजार जोखिम के लिए पर्याप्त पूंजी रखना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्याज दरों, विनिमय दरों और प्रतिभूतियों की कीमतों में अचानक बदलाव से बैंकों को नुकसान हो सकता है। RBI के पूंजीगत जोखिम नियम ऐसे संभावित नुकसान के विरुद्ध बैंकों में पर्याप्त capital buffer बनाए रखने में मदद करते हैं। पुराने RBI ढांचे में भी बाजार जोखिम के लिए पूंजीगत शुल्क में interest-rate instruments, equities और foreign-exchange risk को शामिल किया गया था।