SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ पर केंद्र का रुख: सामाजिक भेदभाव बनाम आर्थिक उन्नति की संवैधानिक बहस
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि SC/ST आरक्षण को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इसका आधार ऐतिहासिक भेदभाव, सामाजिक पिछड़ापन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व भी है। क्रीमी लेयर का सिद्धांत मुख्यतः OBC आरक्षण में लागू होता है, जिसका प्रमुख न्यायिक आधार इंद्रा साहनी मामला, 1992 है और यह EWS आरक्षण से अलग है। State of Punjab v. Davinder Singh (2024) में सुप्रीम कोर्ट ने 6:1 बहुमत से SC/ST के भीतर साक्ष्य-आधारित उप-वर्गीकरण को अनुमति दी। उप-वर्गीकरण का उद्देश्य अधिक वंचित समूहों को लक्षित लाभ देना है, जबकि क्रीमी लेयर का उद्देश्य अपेक्षाकृत उन्नत सदस्यों को आरक्षण से बाहर करना है।
केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जा सकता। सरकार के अनुसार SC/ST आरक्षण का संवैधानिक आधार ऐतिहासिक भेदभाव, सामाजिक पिछड़ापन, जाति/जनजातीय स्थिति और सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसे कारकों से जुड़ा है। इसलिए OBC के लिए विकसित क्रीमी लेयर मानदंड को SC/ST पर उसी रूप में लागू करना उचित नहीं होगा।
‘क्रीमी लेयर’ का अर्थ और OBC में इसका प्रयोग
क्रीमी लेयर का अर्थ किसी पिछड़े वर्ग के उन अपेक्षाकृत उन्नत सदस्यों से है जिन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का सिद्धांत अपनाया जाता है, ताकि सकारात्मक कार्रवाई का लाभ अधिक जरूरतमंद वर्गों तक पहुंचे। इसका प्रमुख न्यायिक आधार Indra Sawhney v. Union of India (1992) है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने OBC आरक्षण को बरकरार रखते हुए OBC की क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने की व्यवस्था स्वीकार की। यह अवधारणा EWS आरक्षण से अलग है, क्योंकि EWS का आधार आर्थिक कमजोरी है, जबकि OBC आरक्षण सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ेपन से संबंधित है।
SC/ST के संदर्भ में बहस अलग क्यों है?
SC/ST समुदायों के संदर्भ में मुख्य तर्क यह है कि केवल आर्थिक उन्नति से जातिगत या जनजातीय पहचान से जुड़े सामाजिक भेदभाव स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बावजूद उसे सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव या पहचान-आधारित पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ सकता है। केंद्र का वर्तमान रुख इसी अंतर पर आधारित है। सरकार ने कहा है कि SC/ST को आरक्षण से बाहर करने के लिए केवल आय को आधार बनाना पर्याप्त नहीं होगा और इसके लिए व्यापक समीक्षा तथा अनुभवजन्य अध्ययन की आवश्यकता होगी।
2024 का ऐतिहासिक SC/ST उप-वर्गीकरण फैसला
यह बहस State of Punjab v. Davinder Singh (2024) मामले से भी जुड़ी है। 1 अगस्त 2024 को सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6:1 बहुमत से माना कि राज्यों द्वारा SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण किया जा सकता है, ताकि आरक्षण का अधिक लाभ उन समूहों तक पहुंच सके जो अपेक्षाकृत अधिक वंचित हैं। न्यायालय ने पहले के E.V. Chinnaiah v. State of Andhra Pradesh (2004) के निर्णय को पलट दिया। हालांकि, उप-वर्गीकरण को empirical data और inadequate representation जैसे प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए; यह मनमाना नहीं हो सकता।
उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर में महत्वपूर्ण अंतर
उप-वर्गीकरण (Sub-classification) का उद्देश्य आरक्षित वर्ग के भीतर अधिक वंचित समूहों को लक्षित लाभ देना है, जबकि क्रीमी लेयर exclusion का उद्देश्य अपेक्षाकृत उन्नत सदस्यों को आरक्षण के दायरे से बाहर करना है। 2024 के फैसले में कुछ न्यायाधीशों ने SC/ST के भीतर क्रीमी लेयर की पहचान और बहिष्करण की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किया था, लेकिन इसे OBC की वर्तमान व्यवस्था के समान कोई स्वतः लागू आय-आधारित व्यवस्था मानना सही नहीं है। वर्तमान में केंद्र का रुख SC/ST पर ऐसी अवधारणा के विस्तार का विरोध करता है।
UPSC के लिए संवैधानिक और सामाजिक महत्व
यह मुद्दा GS Paper-II में सामाजिक न्याय, आरक्षण, समानता, सकारात्मक भेदभाव और न्यायपालिका से सीधे जुड़ा है। इसके प्रमुख संवैधानिक प्रावधान हैं—अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15(4) (SC/ST एवं सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान), अनुच्छेद 16(4) (अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियों में आरक्षण), अनुच्छेद 16(4A) (SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण), अनुच्छेद 335 (सेवाओं में SC/ST के दावों के साथ प्रशासनिक दक्षता) और अनुच्छेद 341/342 (SC/ST की सूची)। UPSC उत्तर में इसे Formal Equality बनाम Substantive Equality, affirmative action, empirical evidence और targeted reservation के व्यापक विमर्श से जोड़ा जा सकता है।
