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UNCCD COP17 में भूमि पुनर्स्थापन, सूखा-लचीलापन और चारागाह संरक्षण पर जोर

Published 1 September 2026

UNCCD COP17 का आयोजन 17–28 अगस्त 2026 को मंगोलिया के उलानबातर में “Restoring Land, Restoring Hope” थीम के साथ हुआ, जिसमें भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण और सूखा-लचीलापन प्रमुख मुद्दे रहे। UNCCD 1994 में स्थापित कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है, जो मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देती है। सम्मेलन में सतत चारागाह प्रबंधन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सूखा प्रबंधन और विज्ञान आधारित निगरानी पर विशेष जोर दिया गया। भारत ने घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों (ONEs) के लिए पहली मार्गदर्शिका जारी की, जिससे जैव विविधता, कार्बन पृथक्करण और पशुपालकों की आजीविका को बढ़ावा मिलेगा।

UNCCD COP17 का आयोजन 17–28 अगस्त 2026 के बीच मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में किया गया। सम्मेलन की थीम “Restoring Land, Restoring Hope” (भूमि का पुनर्स्थापन, आशा का पुनर्स्थापन) थी। इसमें भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण, सूखा-लचीलापन, सतत चारागाह प्रबंधन और भूमि पुनर्स्थापन जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। 2026 को International Year of Rangelands and Pastoralists घोषित किए जाने के कारण चारागाह और पशुपालक इस सम्मेलन के प्रमुख केंद्र में रहे।

UNCCD क्या है?

United Nations Convention to Combat Desertification (UNCCD) वर्ष 1994 में स्थापित एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसका उद्देश्य विशेष रूप से शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटना है। UNCCD, Rio Conventions का हिस्सा है और UNFCCC तथा Convention on Biological Diversity (CBD) के साथ वैश्विक पर्यावरणीय शासन की महत्वपूर्ण व्यवस्था बनाता है।

मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण का अर्थ

मरुस्थलीकरण का अर्थ केवल रेगिस्तान का विस्तार नहीं है, बल्कि शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता एवं पारिस्थितिक क्षमता में गिरावट है। इसके प्रमुख कारणों में जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, अस्थिर कृषि, अनुचित सिंचाई तथा खराब भूमि एवं जल प्रबंधन शामिल हैं। इसका प्रभाव खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका पर पड़ता है।

सूखा-लचीलापन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर जोर

COP17 में सूखे से निपटने के लिए केवल संकट के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पूर्व-तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण पर जोर दिया गया। इसके लिए परिवर्तनकारी सूखा प्रबंधन, अभिनव वित्तपोषण, विज्ञान-आधारित निगरानी एवं प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को महत्वपूर्ण माना गया। यह दृष्टिकोण आपदा प्रबंधन में Reactive Approach से Proactive Approach की ओर बदलाव को दर्शाता है।

घास के मैदान और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (ONEs)

घास के मैदान, सवाना, रेगिस्तान और अन्य Open Natural Ecosystems (ONEs) जैव विविधता, पशुपालन, खाद्य उत्पादन, जल प्रबंधन और Carbon Sequestration में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन भूमि उपयोग परिवर्तन, अत्यधिक चराई और जलवायु परिवर्तन के कारण विश्व के बड़े हिस्से के चारागाह निम्नीकृत हो रहे हैं। भारत ने COP17 में घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों के लिए अपनी पहली मार्गदर्शिका जारी की, जिसमें इनके संरक्षण और वैज्ञानिक पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

भारत के लिए महत्व

भारत में भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण का प्रभाव कृषि, पशुपालन, जल सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और जैव विविधता पर पड़ता है। सतत चारागाह प्रबंधन से मिट्टी की गुणवत्ता, जल संरक्षण, कार्बन पृथक्करण और पशुपालकों की आजीविका को लाभ मिल सकता है। इसलिए भूमि पुनर्स्थापन को जलवायु अनुकूलन, खाद्य सुरक्षा, SDGs और आजीविका सुरक्षा के साथ जोड़कर देखना आवश्यक है। भारत की ONEs मार्गदर्शिका संरक्षण की सोच को केवल वनों तक सीमित न रखकर अन्य प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों तक विस्तारित करती है।

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