रंगपुर–शिवसागर ऐतिहासिक परिसर UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल: अहोम सभ्यता की विरासत को वैश्विक पहचान
असम के रंगपुर–शिवसागर ऐतिहासिक परिसर को UNESCO की Tentative List में शामिल किया गया है, जो अहोम राजवंश की लगभग 600 वर्षों की विरासत को दर्शाता है। अहोम शासक स्वर्गदेव रुद्र सिंह ने 1704 में रंगपुर को नियोजित राजधानी के रूप में विकसित किया था, जिसमें महल, मंदिर, किलेबंदी और जल संरचनाएं शामिल हैं। तलातल घर, रंग घर तथा जॉयसागर, गौरीसागर और शिवसागर जलाशय अहोमों की स्थापत्य एवं उन्नत जल-अभियांत्रिकी क्षमता के प्रमुख उदाहरण हैं। UNESCO ने इसे मानदंड (iii) और (iv) के तहत मूल्यांकित किया है, जो अहोम संस्कृति तथा पूर्व-आधुनिक जल-आधारित शहरी नियोजन की विशिष्टता को दर्शाते हैं।
असम के रंगपुर–शिवसागर ऐतिहासिक परिसर को UNESCO की Tentative List (अस्थायी सूची) में शामिल किया गया है। भारत ने जून 2026 में इसे सांस्कृतिक विरासत स्थल के रूप में UNESCO के समक्ष प्रस्तावित किया था। यह परिसर असम के शिवसागर जिले में स्थित है और अहोम राजवंश की लगभग छह शताब्दियों तक चली राजनीतिक, सांस्कृतिक, स्थापत्य और तकनीकी परंपरा को प्रदर्शित करता है। इसे UNESCO के मानदंड (iii) और (iv) के आधार पर मूल्यांकन किया गया है।
अहोम राजवंश और रंगपुर का ऐतिहासिक महत्व
अहोम राजवंश की स्थापना 13वीं शताब्दी में असम में हुई और इसने ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी में लगभग 600 वर्षों तक शासन किया। रंगपुर को 1704 में अहोम शासक स्वर्गदेव रुद्र सिंह ने एक नियोजित राजधानी के रूप में विकसित किया था। इसकी विशेषता यह थी कि राजधानी की संरचना को नदी, आर्द्रभूमि और प्राकृतिक भू-आकृतियों के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए विकसित किया गया। अहोम शासन का राजनीतिक प्रभाव 1826 की यंदाबू संधि के बाद समाप्त हुआ।
स्थापत्य और जल-अभियांत्रिकी की विशिष्टता
रंगपुर–शिवसागर परिसर की खासियत किसी एक स्मारक में नहीं, बल्कि एक समग्र सांस्कृतिक परिदृश्य (Cultural Landscape) के रूप में इसकी संरचना में है। इसमें महल, मंदिर, किलेबंदी, सड़कें, पुल और विशाल कृत्रिम जल निकाय शामिल हैं। तलातल घर और रंग घर अहोम स्थापत्य के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। रंग घर का उपयोग शाही मनोरंजन और खेल गतिविधियों के लिए किया जाता था। विशाल जॉयसागर, गौरीसागर और शिवसागर टैंक अहोमों की उन्नत जल प्रबंधन एवं जल-अभियांत्रिकी क्षमता को दर्शाते हैं।
मंदिर और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत
परिसर में जलाशयों के आसपास विकसित कई महत्वपूर्ण मंदिर परिसर हैं। जॉयसागर परिसर में जॉयडोल, शिवडोल और देवीडोल जैसी संरचनाएं शामिल हैं। गौरीसागर परिसर में देवीडोल प्रमुख मंदिरों में से एक है, जबकि शिवसागर परिसर में शिव, देवी और विष्णु को समर्पित प्रमुख मंदिर स्थित हैं। इन संरचनाओं से अहोम धार्मिक परंपराओं तथा स्थानीय स्थापत्य शैलियों के बीच हुए सांस्कृतिक समन्वय का पता चलता है।
UNESCO मानदंड और Tentative List का महत्व
रंगपुर–शिवसागर को UNESCO के Criterion (iii) के अंतर्गत अहोम संस्कृति, विश्वासों और राजनीतिक परंपराओं के उत्कृष्ट प्रमाण के रूप में तथा Criterion (iv) के अंतर्गत पूर्व-आधुनिक जल-आधारित शहरी नियोजन, वास्तुकला और समारोह संबंधी संरचनाओं के उदाहरण के रूप में देखा गया है।
UPSC के लिए व्यापक महत्व और संरक्षण की चुनौती
यह परिसर भारत की पूर्वोत्तर सांस्कृतिक विरासत, जल प्रबंधन, शहरी नियोजन, सैन्य वास्तुकला और सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका महत्व भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के ऐतिहासिक संपर्कों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। हालांकि, शहरी विस्तार, अतिक्रमण, जल निकायों में गाद जमाव (siltation) और संरचनाओं के क्षरण जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। UPSC में इसे GS Paper-1 (भारतीय संस्कृति एवं विरासत), GS Paper-2 (अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं/UNESCO) और Essay से जोड़ा जा सकता है। साथ ही, यह उदाहरण बताता है कि विरासत संरक्षण में केवल स्मारकों का संरक्षण पर्याप्त नहीं, बल्कि पूरे सांस्कृतिक परिदृश्य और उससे जुड़ी जीवंत परंपराओं का संरक्षण भी आवश्यक है।